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Thursday, May 21, 2009

मेरी मस्त चुदाई

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समय पीछे चला जाता है लेकिन उसकीकुछ खट्टी मीठी यादें जो मन पर अपना प्रभाव बनाए ही रखती हैं! और जब वेयादें बेचैन करने लगती हैं तो बस बेचैनी से बचने का एक ही मार्ग होता हैवह यह कि उन्हें किसी से बांट दिया जाए ! यह कुछ ऐसी ही याद है जो मैंआपसे बांटना चाहता हूँ! मेरी बी-टेक की परीक्षा का अन्तिम से पहला सेमेस्टर बजाय दिसंबर जनवरी केअप्रैल महीने में समाप्त हुआ। तभी गोरखपुर से चाचा जी की बेटी यानि किदीदी का फोन आ गया कि घर जाने से पहले तीन-चार दिन के लिए आ जाओ। मैं बचपन से ही उनसे लगा था। लेकिन इधर कई साल हो गये उन्हें देखा भी नहीं था, उधर गांव से भी फोन आ गया कि गोरखपुर हो कर आना। दीदी की शादी हुए लगभग दस साल हो गये थे। जीजा जी बिजली विभाग में क्लर्कहैं, ऊपरी आमदनी का प्रभाव घर के रखरखाव से तुरन्त ही लग गया। स्कूल सेलौटे तो मैंने देखा कि टीना और अनिकेत तो इतने बड़े हो गये कि पहचान मेंही नहीं आ रहे थे, लेकिन अनुमान लगाने में को कठिनाई नहीं हुई, मगर उनकेआने के कुछ देर बाद जो अजनबी लड़की में आई उसे देखकर मैं चौंका। सामान्यसे अधिक लम्बी, स्कर्ट के नीचे मेरी निगाह गई तो उसकी लम्बी और पतलीसुन्दर और चिकनी टांगे देख कर मन अजीब सा हुआ। उसने 'मामा जी नमस्ते' कहा तो मेरी दृष्टि ऊपर गई। देखा आंखें फट सी गईं।शरीर के अनुपात से कहीं भारी, लम्बी और भारी उसकी दोनों छातियां उसकेखूबसूरत प्रिन्टेड ब्लाउज फाड़कर बाहर निकलने को आतुर दिखीं। उसने संभवतःमुझे देखते हुए देख लिया। वह शरमाई तो मैंने निगाहें नीचे कर लीं। तभी अन्दर वाले कमरे से दीदी आगईं। मैंने तब उनको भी ध्यान से देखा। जो दीदी पहले दुबली पतली थी अब उनकाशरीर भर गया था और काफी सुन्दर लगने लगी थीं। दीदी ने बताया कि यह सोनम है जेठ की बेटी। गांव से आठ पास करके साथ ही है अबकी बार बी ए के प्रथम वर्ष की परीक्षा दे रही थी और आज ही अन्तिम पेपर था। शाम तक सोनम मुझसे काफी घुलमिल गई। वह बेहद बातूनी और चंचल थी। अब तक कईबार वह किसी न किसी बहाने अपने शरीर को मेरे शरीर से स्पर्श करा चुकी थी। उसकी बातों के केन्द्र में गर्लफ्रेन्ड और लड़के ही अधिक थे। दोनों बच्चेभी परीक्षा देकर अगली कक्षाओं में आ गये थे, अभी पढ़ाई का दबाव भी अधिकनहीं था। सोनम तो मेरे आने से बहुत ही प्रसन्न थी। असल में मेरा गांव और दीदी केगांव से बहुत दूर नहीं था। दो दिन बाद उसे मेरे साथ उसे भी जाना था। जीजा जी इधर काम के कारण काफी देर से आने लगे थे इस लिए सब्जी लेने दीदीही जातीं। शाम में वह अनिकेत को लेकर मार्केट चली गई तो घर में मैं टीनाऔर सोनम ही थे। टीना अभी नादान थी। फर्श पर बिछे गद्दे पर मैं लेटा था। टीना मेरे पैर कीउंगलियों को चटका रही थी। बातें करते सोनम ने कहा,'' लाओ मैं सर दबा दूं।'' फिर मेरे बिना कुछ कहे ही मेरे सिर के पास आकर बैठ गई। और सर में अपनीउंगलियां धीरे-धीरे चलाने लगी। धीरे-धीरे उसके शरीर की सुगंध मुझे मस्तकरने लगी। मैंने आंखें ऊपर उठाकर देखा तो उसकी बड़ी नुकीली चूचियां मेरेसर पर तनी थी। संभवतः वह भी उत्तेजित सी थी, क्योंकि मुझे लगा कि उसकेचूचुक भी तने हैं। उसने ब्रा नहीं पहनी थी। मैंने अंगड़ाई लेने के बहाने हाथ पीछे किया तो मेरे पंजे उसकी चूचियों सेछू गये। लेकिन मैंने रुकने नहीं दिया और टीना से कहा, '' अब बस, जाओ'' वह जाकर टीवी देखने लगी। सोनम उसी तरह मेरे बालों में उंगली किये जा रहीथी। मैंने फिर सामने टीना की तरफ देखते हुए फिर हाथों को पीछे ले जाकरउसकी चूचियों से स्पर्श कराते हुए वहीं रोक दिया। उसने कोई प्रतिक्रियानहीं दी, हां हाथ अवश्य रुक गये। एक पल रुकने के बाद मैं हौले हौले उसकी चूचियों पर हाथ फिराने लगा। कुछक्षणों बाद उसने मेरे हाथ को वहां से हटाकर धीरे से कहा, ''टीना छोटीनहीं!'' उसके इस उत्तर से मेरी बांछें खिल उठीं। मैंने हाथ को अंगड़ाई के बहाने लेजाकर उसकी जांघों पर रख दिया। वह चिकनी और संभवतः बरफी की तरह सफेद थीं।मैं रह-रह कर उसके पेड़ू को भी छू देता। उसने कच्छी नहीं पहन रखी थी। उसकीझांटों और मेरे हाथों के बीच उसकी सलवार का झीना कपड़ा ही था। सामने मेरा लिंग अकड़कर खड़ा हो गया और मेरे लोअर के अन्दर बांस की तरहतनकर उसे उठा दिया। जब सोनम की दृष्टि उस पर पड़ी तो वह मुस्कुराने लगी। मैंने अपने हाथों को फिर ऊपर लेजा कर उसकी चूचियों से स्पर्श कराया तो लगा कि उसकी घुंडियां बिल्कुल तन कर खड़ी हो गई हैं। छुआ-छुई का यह खेल चल ही रहा था तभी टीना फिर आ गई और पास बैठ गई। हमदोनों रुक गये। मैंने झट अपनी लम्बी टी-शर्ट को नीचे खींच दिया, लेकिनहमारे महाराज जी झुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे तो मैं झट से उठ गया। सोनम भी मेरे साथ ही उठ गई। उसने चुन्नी अपने सीने पर नहीं रखी थीं।चूचियां कपड़े के ऊपर से ही वह पूरी तनी बिल्कुल स्तूप की तरह लग रही थीं।रसोई की तरफ जाते हुए मैंने कहा, '' चाय पीने का मन हो रहा है।'' '' चलो बना दूं।'' कहते हुए वह मेरे पीछे रसोई में आ गई। अन्दर जाते ही मैंने उसे कचकचाकर लिपटा लिया और पूरी शक्ति से उसके शरीरको जकड़ लिया। वह कसमसाकर कुछ कहती इससे पहले ही अपने ओंठ उसके ओंठों पररखकर जबरदस्ती उसके मुंह में अपनी जीभ डाल दी। वह गों-गों कर उठी तो जीभ को निकाला। तब वह कांपते स्वर में बोली, ''छोड़ो अभी टीना आ जाये तो !'' मैंने उसे छोड़कर कहा, ''भगवान कसम अभी तक मैंने इतनी कसी और सुन्दर चूंचियां तो फिल्मों की हीरोइनों तक की नहीं देखी!'' वह अब स्थिर हो चुकी थी। बोली, '' तुम तो बहुत हरामी हो मामा !'' मैंने धीरे से कहा, '' सोनम मैं बिना तुमको लिए छोड़ूंगा नहीं !'' उसने ठेंगा दिखाते हुए कहा,'' बड़े आये लेने वाले !'' और फिर मेरे अभी तक खड़े लन्ड को ऊपर से नौच कर भाग गई। दीदी सामान लेकर आईं और रसोई में चली गईं। दोनों बच्चे पढ़ने बैठ गये तोमैं छत पर चला गया और कुछ देर बाद सोनम को भी पुकारकर ऊपर बुला लिया।हमारी दीदी का मुहल्ला निम्न-मध्यवर्गीय मुहल्ला था। छतें एक दूसरे से सटीथीं। अंधेरा पूरी तरह से घिर आया था, इसलिए इक्का-दुक्का लोग ही अपनी छतपर थे। '' सोनम दोगी नहीं?'' '' क्या?'' '' बुर ! या अगर हो गई हो तो चूत!'' '' मतलब?'' '' मतलब यह कि अगर किसी से चुदवा चुकी हो तो चूत हो गई होगी नहीं तो अभी बुर ही होगी ! बताओ क्या है ?'' '' हट !'' '' हट नहीं ! नहीं प्लीज सोनम ! दे दो न!'' मैंने उसे पलसाने के लिए कहा। '' बहुत बड़ा पाप है। फिर तुम तो मामा हो !'' '' मैं कोई सगा मामा थोड़ी न हूं?'' ''चाहे जो हो, मैं यह काम नहीं करूंगी। मुझे डर लगता है !'' उसने इस अन्दाज में कहा कि मुझे लग गया कि अभी तो बात बनने वाली नहीं, तोमैंने बातो को दूसरी तरफ मोड़कर कहा, ''अच्छा सच बताओ किसी से करवाया हैकि नहीं?'' '' भगवान कसम नहीं।'' '' मिंजवाई हो?'' '' भला कौन लड़की होगी जिसकी किसी न किसी ने कभी मींजी न हो।'' फिर उसने कहा, '' तुमने मामा ? तुमने मींजी हैं?'' '' हां, तुम्हारी ही !'' '' धत! पहले?'' '' मींजी तो कइयों की है, और ली भी है, लेकिन पूछना नहीं किसकी। कभी बादमें बताऊंगा। अच्छा बताओ तुम इसके बारे में ठीक से जानती हो?'' उसने मुस्कुराकर कहा, '' किसके?'' मैंने खीजकर कहा, '' बुर की पेलाई या कहो चुदाई के संबंध में!'' '' हाय राम यह भला कौन नहीं जानती होगी? इतना तो टीना को भी पता होगा !'' '' अच्छा अपनी बताओ कि तुम को कैसे पता चला?'' '' क्यों बताऊं?'' मैंने अन्त में कहा, ''सोनम मैं बिना लिए तुम्हारी छोड़ूंगा नहीं !'' और फिर इधर उधर की बातें होने लगीं। बात फिर आकर पेलने, चोदने और लन्ड,बुर पर रुक गई। अन्त में सोनम ने यह वादा किया कि ऊपर से मैं चाहे जो करलूं, लेकिन वह किसी भी कीमत पर मेरा लन्ड अपनी बुर में डालने नहीं देगी। बाद के दो दिनों में वह सोई तो दीदी के कमरे में क्योंकि दीदी को माहवारीआ रही थी। यह भी उसी ने बताया, लेकिन दिन में जैसे ही अवसर मिलता हम दोनोएक दूसरे को नौचने चूसने में लग जाते। एकाध बार तो वह बुरी तरह सेउत्तेजित भी हो गई, लेकिन उचित अवसर ही नहीं मिला। दीदी भी न जाने क्योंहमें अकेला नहीं छोड़ रही थीं। यद्यपि मुझे अन्त तक यह लगने लगा कि अगर अकेले मिल जाए तो करवा लेगी। मैं तीसरे दिन के बजाय चौथे जाने के लिए तैयार हुआ। उस दिन इतवार था। शहरसे हमारे गांव की दूरी अधिक नहीं थी। तीन घण्टे बस से लगते थे। बीच मेंबदलकर अन्त में चार किलोमीटर का पैदल या फिर अपने निजी वाहन का रास्ता है।पैंसजर ट्रेन भी जाती थी, समय थोड़ा अधिक लगता था परन्तु आराम था। बारह बजे की गाड़ी थी। प्रोग्राम यह बना कि चार बजे के लगभग गाड़ी पास केकस्बे पहुँच जायेगी फिर वहां से बस पकड़कर एकाध घंटे में अपने गांव कीसड़क पर पहुंच जायेंगे। आगे अगर फोन लग गया तो कह दिया जायेगा कोई आजायेगा, नहीं तो किसी रिक्शा या हम लोग पैदल ही निकल जायेंगे। हमारा क्षेत्र बहुत शांत है। किसी तरह की चोरी डकैती या दूसरी घटनाओं सेमुक्त ! इसलिए हम लोगों को आने जाने का भय नहीं होता अक्सर किसी कारण सेदेर हो जाने के बाद लोग बारह-बारह बजे रात तक में अकेले आ जाते। यद्यपि सोनम ट्रेन से आने में घबरा रही थी, कहीं लेट न हो जाये! हुआ भी वही, बारह से एक बज गया फिर दो, तब जाकर कहीं गाड़ी आई। घर फोन सेबात करने की कोशिश की लेकिन संभवतः सम्पर्क ना होने के कारण बात नहीं होपाई। अभी हमारे यहां यह सुविधा उतनी अच्छी नहीं थी। जाते जाते चाचा कह गयेकि मुहानी पर कोई आ गया तो आ गया, नहीं तो वहीं सम्पत साह के यहां सामानरख कर पैदल ही चले जाना। हम लोग बैठे तो देर हो जाने की घबराहट थी लेकिन गाड़ी में बैठते ही हवा होगई। सोनम खिड़की तरफ बैठी, फिर मैं। हम लोगों की यात्रा तो ऐसे कटी जैसेपति पति पत्नी हों। वह लगातार मेरे हाथों से खेलती रही। कभी-कभी अपनेहाथों की कुहनियों को मेरे लंड पर पैंट के ऊपर से दबाती मेरे हाथ तो पूरीयात्रा में किसी न किसी तरह उसकी चूचियों के संपर्क में ही रहे। अवसर देखकर कामुक बातें भी होती रहीं। मुझे उसकी जानकारियाँ सुनकर आश्चर्यहुआ। उसने बताया कि दीदी और जीजा कभी कभी गंदी फिल्म देखते हैं। जिसमे कभीदो आदमी एक की लेते हैं तो कभी एक दो की ! कहने लगी कि चाचा चाची की निरोध लगाकर ही करते हैं। उसने यह भी बताया किउसने दरवाजे में एक छेद ऐसा कर रखा है कि जिससे वह जब चाहे उन लोगों कीचुदाई देखे, मगर वह जान नहीं सकते। ऐसे में यात्रा जब समाप्त हुई तो पता चला कि गाड़ी रास्ते और लेट हो गई।स्टेशन पर पहुंचते-पहुंचते सात बज गये। हल्का अंधेरा हो गया। सोनम डरनेलगी। लेकिन बस जल्दी ही मिल गई। कुछ दूर जाने के बाद पहिया पंक्चर हो गया।और देर होती देख सोनम घबराने लगी, लेकिन मेरा मन प्रसन्नता से झूम उठा।मैंने निश्चय कर लिया अब सोनम को कुंआरी नहीं रहने दूंगा। जब हम लोग मुहानी पर पहुंचे तो आठ का समय हो गया था। अंधेरा घिर आया था,लेकिन चांद भी निकलने की तैयारी में था। सोनम तो रोने लगी कि अब क्या होगा! मैंने दिलासा दिया तो जाने को तैयार हुई। सामान साह जी के यहां रखने गये तो योजना के अनुसार सोनम को थोड़ा दूर खड़ाकरके कह दिया कि चाची हैं। वह अड़ गये कि सायकिल ले लो, लेकिन मैंने यहकहकर मना का दिया कि वह पैदल ही जायेंगी। गांव में जाने का एक थोड़ा निकट का रास्ता था, लेकिन वह पलाश और कुश केछोटे से जंगल में से जाता था। मैंने वही रास्ता पकड़ा तो वह रुक गई। क्योंकि उसे पता था कि एक सड़क भी है, लेकिन मेरे समझाने और डर समाप्तकरने के बाद ही वह जाने को तैयार हुई। पगडंडियां तमाम थीं। मैंने जानबूझकरअलग पगडंडी पकड़ी। चूंकि बचपन से मैं इतनी बार इधर से गया था कि मुझेरास्ते का चप्पा चप्पा पता था। मेरे कंधे पर छोटा सा बैग था। जिसमे मेरेकपड़े थे। उसका सामान तो रख दिया था। उसने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ लिया था। थोड़ी दूर जाकर मैंने कहा, '' हाथ छोड़ो, मैं जरा मूत लूं !'' वह बोली, '' नहीं मुझे डर लग रहा है, यहीं मूतो !'' तब तक चांदनी के प्रकाश का प्रभाव वातावरण में उभर गया था। मैं उत्तेजितहोने लगा। मुतास के कारण मेरा लंड पहले से ही खड़ा था मैंने उसी के सामनेलंड को पैंट से निकाला और छल छल मूतने लगा। मूतने के बाद जब लंड हिलाकरबूंदें गिराने लगा तो वह बोली, '' बीज गिरा रहे हो मामा?'' मैंने कहा, '' बीज तो तुम्हारी बुर में गिराऊंगा।'' '' कैसे?'' '' तुम्हें चोदकर और कैसे?'' इतना कह कर मैं लंड को यूं ही बाहर लटकाये चलपड़ा। और हाथ उसके कंधे पर रखकर बगल से उसकी चूचियों को सहलाने लगा। वहकड़ी होने लगीं तो और तेज मलने लगा। वह उत्तेजित होकर मुझसे चिपकने लगी।चूचियां बड़े लम्बे आम का रूप धारण करने लगीं। मैंने रुककर मुंह में सटाकरअपनी जीभ उसके मुंह में डालकर जो चूसा तो बोली, '' मामा लगता है कि आज तुममुझे खराब करके ही छोड़ोगे !'' " मतलब?'' '' मतलब न पूछो!'' कहकर वह बोली, मुझे भी मूतना है !'' कहकर वह वहीं सलवारखोलकर बैठ गई। जानवरों को चारा खिलाने वाली नाद की तरह उसके चूतड़ सामने आगये। वह सीटी बजाती शर-शर मूतने लगी। मैं अपने खड़े लन्ड को उसकी कनपटियोंसे रगड़ने लगा। मूत कर उठी तो सलवार बांधने से पहले ही मैंने उसकी झांटों से भरी चूत कोमुट्ठी में पकड़ लिया वह मूत से गीली हो रही थी। उसने हल्का सा प्रतिरोधकिया, '' छोड़ो न!'' अब तक चांदनी खिल चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा था। मुझे याद आया कि थोड़ा अन्दर एक छोटी सी पोखर है। मैं उसी तरफ उसे लिपटाये चला गया। पोखर में पानी तो कम था, लेकिन उसके किनारे साफ स्थान था। पास में सफेदपुष्प खिले थे। वातावरण मादक था। उसने मस्ती भरे स्वर में कहा, ''यहांक्यों आये?'' मैंने कहा, '' तुम्हें लेने के लिए।'' फिर उससे खड़े ही खड़े ही लिपट गया। वह मेरे ही बराबर थी। उसके बाल खुल गये थे। उसकी कड़ी होकर पत्थर चूचियांमेरे सीने से टकराकर मेरे अन्दर आग भर रही थीं। मैंने हाथ को पीछे ले जाकरउसके उभरे चूतड़ों को पकड़ लिया और मुंह को उसके मुंह से लगाकर उसके चेहरेऔर होंठों को चूसने लगा। उसने भी मुझे जकड़ लिया। मेरा लंड खड़ा होकरसलवार के ऊपर से उसकी चूत को चूमने लगा। वह थोड़ी देर बाद अलग होकर बोली, '' अब चलो मुझे डर लग रहा है।'' मैंने उसकी बात को अनसुना करते हुए बैग खोल कर अपनी लुंगी निकाल कर बिछादी और कहा, '' अब न तो मैं बिना चोदे रह सकता हूं और नहीं तुम बिना चुदाये!'' फिर मैंने उसे भूमि पर लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़कर उससे लिपट गया। उसनेभी मुझे कस लिया। पांच मिनट की लिपटा-लिपटी के बाद मैं उठा और उसे उठाकरउसकी कुरती को शमीज़ सहित ऊपर खींच कर उतार दिया। वह ऊपर से नंगी हो गई।दोनों छातियां ऐसी गोरी चिकनी और फूलकर खड़ी हो गई थीं मानो उन्हें अलग सेचिपका दिया गया हो। उन्हें नीचे से ऊपर मींजते सहलाते हुए कहा, '' सच बताओसोनम मेरे अतिरिक्त तुम्हारे दो पपीतों को किसी और मींजा है?'' '' भगवान कसम नहीं। जब मैं गांव में थी तो संध्या भाभी जरूर मींजती और कभीकभी चूसतीं भी थीं, लेकिन तब यह छोटी थीं। कामता भैया कलकत्ता रहते थे। वहअपनी चूचियां चुसाती भी थीं। यहां किसी ने कभी नहीं कुछ किया।'' " तो आज मैं सब कुछ करूंगा !'' कहते हुए मैंने उसकी चूचियों को चूसनाआरम्भ कर दिया। उसका सीना मेरे थूक भीग गया। वह वहीं लेट गई और अकड़ने लगी। तब मैं उठा और अपनी पैंट और चड्ढी साथ उतार दी। बल्ल से मेरा लंड सामने आगया। वह उसे ही देखने लगीं। मेरी झांटे काफी बड़ी हो गईं थीं। नसें तनकरअकड़ गई थीं। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। वह वैसे हीपकड़े रही। उसकी खड़ी चूचियां मेरे होंठों के सामने तनी थीं। तब मैंनेकहा, '' सहलाओ।'' वह बोली, '' शरम आती है।'' '' लो अभी मैं शरम मिटाता हूं।'' कहकर मैंने उसके सलवार का नाड़ा पकड़करखींच दिया। सलवार खुल गई। नीचे से पकड़कर खींचा तो उतर गई। वह शरमाने लगी।उसकी भी झांटे काफी बड़ी थीं। उसकी बुर उसी में छुपी थी। '' कभी-कभी इसे साफ कर लिया करो।'' कहकर मैं हथेली से उसकी बुर सहलाने लगा। सोनम सिसियाते हुए बोली, '' तुम्हारी भी तो बड़ी है।'' और फिर मेरे लंड पर अपनी हथेलियां चलाने लगी। मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई, लगा कि अब मैं कही झड़ न जाऊं। उसकी बुरभी गीली हो गई थी। उसकी बुर का दाना उभर आया था। यद्यपि मैंने तो रास्तेमें सोचा तो बहुत कुछ करने के लिए था, लेकिन लगा कि अब मैं कहीं बिनाअन्दर डाले ही न झड़ जाऊं तो उससे कहा, '' टांगें फैलाकर लेटो।'' वह लेटते हुए बोली, '' छोड़ दो न मामा!'' '' पागल हूं मैं !'' कहकर मैंने अपनी शर्ट उतार दी ओर उसके पूरे शरीर कोसहलाया और फिर उसकी टांगों के बीच में जाकर उसकी बुर के छेद को हाथों सेटटोलकर उसपर अपने लंड का सुपाड़ा रखकर औंधे मुंह उसपर लेट गया और कमर परदबाव डाला तो भीग चुकी उसकी बुर में मेरा लंड सक से चला गया। '' हाय राम मैं मरी!'' उसने कहा। मैंने कहा, '' झिल्ली फट गई?'' '' पता नहीं!'' मैं एक पल के लिए रुका फिर कुहनियों को भूमि पर टिका कर उसकी चूचियों कोमलते हुए कमर चलाते हुए सोनम को हचर-हचर चोदने लगा। सात आठ धक्के के बादवह भी कमर चलाने लगी और अपने हाथों से मुझे कस लिया। मैं उसे चोदे ही जारहा था। उसका शरीर महकने लगा। उसके मुंह से हों-हों का स्वर निकलने लगा। मेरी कमर और तेज चलने लगी। उसने किचकिचाकर मुझे दबोच लिया। अन्त में मैंभल्ल से उसकी चूत में झड़ गया। मैं कुछ देर बाद उसके ऊपर से उठा। मेरा लंडबीज से सना था। उसकी चूत भी वैसे ही बीज से भरी थी। वह लम्बी लम्बी सांसेभर रही थी। मैंने पास पड़ी पैंट से रुमाल निकालकर पहले अपने गीले लंड कोपौंछा फिर उसकी बुर को। अब वह स्थिर हो गई थी। बोली, '' मामा अगर कहींबच्चा ठहर गया तो?'' ' ' पागल एक बार में बच्चा नहीं ठहरता है। उठो ! बैठकर मूत दो ! बीज नीचे गिर जायेगा।'' मूत कर वह उठी तो मैंने उसे अपनी टांगों को सीधे फैला लिया और उसकी टांगोंको अपनी कमर के दोनो तरफ करवा कर बैठा लिया। उसकी चूत से मेरा सिकुड़ा लंडस्पर्श कर रहा था। मांसल चूचियां मेरे सीने से पिस रही थीं। उसके खुले बालउसकी पीठ पर फैलकर वातावरण को मादक बना रहे थे। वह बोली, '' अब चलो। अपनीतो कर ही ली। देर हो जायेगी।'' '' देर तो हो गई। थोड़ी और सही। ऐसा सुनहरा अवसर अब तो कभी नहीं मिलेगा।'' उसने कोई उत्तर नहीं दिया इसका मतलब था कि उसकी भी मौन स्वीकृति थी। मेरेहाथ उसकी पीठ से लेकर उसके नाद जैसे भारी चूतड़ों की दरार तक चल रहे थे। वह भी मेरे बालों में अंगुलियाँ चला रही थी। कभी कभी मेरी कनपटियो को भीसहलाने लगती। मैंने यूं ही पूछा, ''सोनम कभी सोचा था कि तुम्हारी चुदाईऐसे रोमांटिक वातावरण में होगी?'' उसने कोई उत्तर नहीं दिया। मैंने उसे खड़ा किया तो वह रोबोट की भांति खड़ीहो गई। बिल्कुल नंगी ! मैं भी मनुष्य के आदिम रूप में था। हम नंगे पोखर केकिनारो पर टहलने लगे। उसके चूतड़ चलते में हिल रहे थे। चिकने थे। एक भीरोयां नहीं था। जांघं और पिंडलियां भी चिकनी थी। झांटें जरूर पेड़ू तकफैली थीं। चूची हिल नहीं केवल थरथरा रही थी। मैंने टहलते हुए बुर पर हथेली रखते हुए कहा, '' सोनम झांट हेयर रिमूवर से बना लिया करो। अभी लगता है एक बार नहीं किया?'' '' नहीं साफ तो किया है, लेकिन मुझे शरम आती है। जब चाची को याद आता है तबलाकर देती हैं तो करती हैं, स्वयं तो एकदम चिकना किए रहती हैं।'' फिर दोनों हाथों की अंगुली और अंगूठे को मिलाकर चूत का आकार देते हुए कहा, '' भोंसड़ा हो गई है, फिर भी !'' मैंने कहा, '' उन्हें चुदना जो होता है, जब तुम लगातार चुदोगी तो अपने आप साफ रखोगी।'' '' तुम तो चोदते हो तब भी जंगल उगा लिया है।'' कहकर वह मेरे लंड को पकड़ कर खेलने लगी और पेलड़ की गोलियों से खेलने लगी। मुझे न जाने क्या सूझी कि मैंने उसे उठाकर सामने से उसे अपने कंधे पर बैठालिया। उसकी टांगें पीठ की तरफ हो गईं। उसकी चूत मेरे मुंह के सामने आ गईऔर मन में आया कि लाओ चूम लूं, लेकिन सोचा पता नहीं क्या सोचे तो अपनीठुड्डी उसकी बुर से रगड़ने लगा। उसकी झांट के बालों का स्पर्श चेहरे कोअजब आनन्द दे रहा था। इसी के साथ मैंने अपने हाथों को ऊपर उठाकर उसके दोनों दूधों को मसलने लगा।बुर चूत की बातें होती रहीं और हम फिर उत्तेजित हो गये। मेरा लंड दुबाराकील की तरह खड़ा होकर ऊपर उठ गया। इसी तरह पोखर का तीन चक्कर लगाते-लगातेवह उत्तेजित हो गई । तो बोली, '' मामा चलो फिर चोदो मगर दूसरी तरह से।'' मैं उसके इस खुले आमन्त्रण से हिल गया। कंधे से उतार कर ले जाकर लुंगी परउसे झुका दिया और हथेली पर अपने और उसके मुंह से थूक लेकर अपने लण्ड परमला और चूत को ढके झांटों को इधर-उधर करके छेद पर रखकर कसा तो एकदम अन्दरचला गया। फिर कमर हिलाहिलाकर उसे चोदने लगा। कुछ पल बाद लंड निकाला तो देख कि उसकी बुर का छेद खुल चुका था। उसका चनाभी फूल गया था। फिर मैं भूमि पर लेट गया। मेरा लंड हवा में तना था। मैंनेउससे कहा, '' सोनम आओ ! इसपर टांगें फैलाकर बैठो।'' वह बोली, '' नहीं ! पूरा अन्दर चला जायेगा ! दर्द होगा !!'' '' यह सब कहने की बात है, और मजा आयेगा। बैठकर तो देखो !'' वह दानों टांगों को इधर उधर करके बुर के छेद को लंड के निशाने पर लेकरबैठी तो एकाएक कमर को पकड़कर दबा दिया। वह घप्प से गिर गई। सट से लंडअन्दर पूरा उसकी बुर की जड़ तक चला गया। पहले मैंने नीचे से अपनी कमर कोहिलाया फिर वह भी हचर-हचर अपनी कमर चलाने लगी। मैं सामने उसकी स्तूप कीतरह हिल रही चूचियों को सहलाने लगा। बढ़ती उत्तेजना के साथ मेरी और उसकीगति तेज हो गई। अन्त में मैं फल्ल-फल्ल झड़ने लगा। वह अजब अजब स्वरनिकालने लगी और औंधे मुंह मेरे ऊपर गिर पड़ी।

2 comments:

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